Hindi Poem on Kuch Ruthe Se Lagte Ho

कुछ कुछ रूठे से, लगते हो,
शायद अंदर तक टूटे लगते हो ॥

बिखरे टुकड़ो की आहट सुनी है मैंने
ये किसके हाथों से छूटे लगते हो ॥

नम आँखें सब बयाँ, कर रही है,
अपनों के हाथों से लूटे लगते हो ॥

जोड़ दूँ ज़रा क़रीब आओ तुम मेरे
तुम जहाँ जहाँ से, टूटे लगते हो ॥

मुस्कुराकर ग़म अपना छुपा रहे हो
मेरी तरह तुम भी झूठे लगते हो ॥

आओ तुम्हें इक नाम मैं दे दूँ,
तुम गुलमोहर के बूटे लगते हो ॥

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